अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प ने पिछले हफ़्ते इराक़ के प्रधानमंत्री मुस्तफ़ा अलकाज़ेमी से मुलाक़ात के बाद वाइट हाउस में एक संयुक्त पत्रकार सम्मेलन में कहा कि अमरीकी सैनिक बड़ी संख्या में इराक़ से निकल चुके हैं और अंतर्राष्ट्रीय गठजोड़ के सैनिक भी तीन साल के अंदर इराक़ से निकल जाएंगे। इस मुलाक़ात के बाद इराक़ के प्रधानमंत्री ने कहा कि वे अमरीकी राष्ट्रपति के साथ इस देश के सैनिकों के इराक़ से निकलने के टाइम टेबल पर सहमत हुए हैं। उन्होंने इसी के साथ कहा कि इराक़ इस बात की इजाज़त नहीं देगा कि उसकी धरती को किसी अन्य देश पर हमले के लिए इस्तेमाल किया जाए।
यह ऐसी स्थिति में है कि जब दोनों पक्षों ने एक संयुक्त बयान में आर्थिक, सैन्य व सुरक्षा क्षेत्रों में अपने रणनैतिक संबंधों की बात कही है। टीकाकारों का कहना है कि बग़दाद व वाॅशिंग्टन के बीच रणनैतिक संबंधों की बात केवल दिखावा है और ट्रम्प अपने राष्ट्रपति काल के अंतिम दिनों में इराक़ के साथ अपनी सरकार के समझौते और अलकाज़ेमी के साथ अपनी मुलाक़ात को अहम दिखा कर जनता के सामने विदेश नीति के क्षेत्र में कुछ उपलब्धि दर्शाना चाहते हैं। सच्चाई यह है कि ट्रम्प व काज़ेमी के कूटनैतिक बयानों के बीच अमरीकी सरकार ने पिछले 17 बरसों में इराक़ में अपनी भरपूर उपस्थिति के दौरान कभी भी इस देश के विकास के लिए कोई काम नहीं किया है बल्कि उसने अन्य देशों की ओर से इराक़ में पूंजी निवेश के मार्ग में रोड़े ही अटकाए हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल महदी की कोशिश थी कि बुनियादी आर्थिक ढांचे के विकास समेत विभिन्न क्षेत्रों में चीन के साथ लगभग 400 अरब डाॅलर के समझौतों पर हस्ताक्षर करें लेकिन अमरीका ने उनकी राह में अनेक रुकावटें खड़ी कीं बल्कि उनकी सरकार को ही गिराने की कोशिश की। इराक़ में दाइश के उदय और इस आतंकी गुट के साथ अमरीका के रवैये ने स्पष्ट कर दिया कि वाइट हाउस न केवल यह कि इस तकफ़ीरी आतंकी गुट से मुक़ाबले के लिए इराक़ी सेना की सामरिक मदद करने का कोई इरादा नहीं रखता बल्कि ज़मीनी प्रमाणों के आधार पर उसने इस गुट को इराक़ की सरकार पर प्रहार करने और उसे कमज़ोर बनाने के लिए इस्तेमाल किया। अगर स्वयं सेवी बल के गठन की आवश्यकता का आयतुल्लाहिल उज़मा सीस्तानी का फ़तवा और ईरान का समर्थन न होता तो आज बग़दाद की सरकार गिर चुकी होती और इराक़ टुकड़े-टुकड़े हो गया होता।
इस राह में इराक़ में मौजूद अमरीकी सैनिकों को बग़दाद सरकार पर दबाव डालने और उसे कमज़ोर बनाने के लिए ताक़त के एक हथकंडे के रूप में इस्तेमाल करना, अमरीकी अधिकारियों के लिए एक मूल सिद्धांत है। अमरीका द्वारा इराक़ पर क़ब्ज़ा किए जाने के बाद उसके क्रियाकलाप, सद्दाम का तख़्ता पलटे जाने के बाद इस देश के हालात और स्वाधीन सरकार के गठन को अमरीका की क्षेत्रीय योजनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंच जाएंगे कि अमरीका किसी भी स्थिति में इराक़ एक मज़बूत, स्वाधीन और एकजुट देश बने क्योंकि इस स्थिति में उसकी क्षेत्रीय नीतियां और योजनाएं विफल हो जाएंगी।
अमरीका, क्षेत्र में ज़ायोनी शासन के वर्चस्व को बाक़ी रखने के लिए जातीय व धार्मिक आधारों पर देशों का बंटवारा करना चाहता है और इराक़ में यह साज़िश उस समय कामयाब होगी जब इस देश को आर्थिक विकास के बजाए आर्थिक व सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का समाना करना पड़े और व्यवहारिक रूप से इराक़ी राष्ट्र में जातीय व धार्मिक दृष्टि से दरार पड़ जाए। सुरक्षा व सैन्य क्षेत्र में इराक़ से रणनैतिक संबंध का अमरीका का दावा भी विचार योग्य है। उसने इराक़ी संसद के विधेयक की अनदेखी करते हुए अपने सैनिकों को इराक़ के शहरों से बाहर निकाल लिया है लेकिन उन्हें अमरीका वापस नहीं बुलाया है बल्कि इराक़ की ही विभिन्न सैन्य छावनियों में तैनात कर दिया है और इन छावनियों को पैट्रियट मीज़ाइलों से लैस कर दिया है ताकि उसके सैनिक इराक़ के प्रतिरोधकर्ता गुटों के हमलों से सुरक्षित रहें।